JHAHIN/2014/58773

राहुल की ‘गांधीगिरी’ बनाम सत्ता की बेचैनी

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आईविजन व्यूरो

देश की समकालीन राजनीति में युवाओं और छात्रों का मुद्दा एक बार फिर सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव का मुख्य अखाड़ा बन गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा छात्रों और युवाओं के मुद्दों को मुखरता से उठाए जाने और उनके राष्ट्रव्यापी संपर्क अभियानों ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रणनीतिकारों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। पेपर लीक, परीक्षा अनियमितताओं और बेरोजगारी के खिलाफ पुणे में आयोजित उनके ‘छात्रों की गूंज‘ कार्यक्रम में तमाम प्रशासनिक अड़चनों के बावजूद युवाओं की भारी भागीदारी, इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश का युवा वर्ग अब एक नए राजनीतिक विकल्प की ओर उम्मीद से देख रहा है।

हाल ही में झारखंड में छात्र आंदोलन की समाप्ति में राहुल गांधी के परोक्ष हस्तक्षेप और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा छात्रों की मांगों को स्वीकार किए जाने से जहां प्रदेश में विपक्ष के हौसले पस्त हुए हैं। वहीं इस कदम ने न केवल राज्य की गठबंधन सरकार को एक बड़े संकट से उबारा, बल्कि राहुल गांधी के राजनीतिक कद भी युवाओं के बीच बढ़ा। इस राजनीतिक बढ़त का सबसे आक्रामक रूप हाल ही में दिल्ली की सड़कों पर देखने को मिला। 20 जुलाई के जंतर-मंतर छात्र आंदोलन के दौरान कथित तौर पर पुलिस द्वारा चलाई गई पेलेट गन से गंभीर रूप से घायल 19 वर्षीय छात्र साहिल लोचब को न्याय दिलाने के लिए राहुल गांधी स्वयं दिल्ली के संसद मार्ग थाने पहुंच गए। पुलिस द्वारा मामले में एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी करने पर, वे पीड़ित छात्र के साथ थाने के बाहर ही करीब 6 घंटे लंबे धरने पर बैठ गए। अंत में दिल्ली पुलिस को झुकना पड़ा और प्राथमिकी दर्ज की गई। ‘गांधीगिरी‘ और सीधे सड़क पर उतरने की इस शैली ने युवाओं के उस भरोसे को और मजबूत किया है कि कोई उनके हक के लिए व्यवस्था से सीधे टकराने को तैयार है।

इस उभरते हुए जनसमर्थन के बीच सत्ता पक्ष की बेचैनी भी साफ देखी जा सकती है। हाल ही में संपन्न हुआ संसद का मानसून सत्र इसका बड़ा उदाहरण रहा। पूरे सत्र के दौरान विपक्ष ने नीट (NEET) पेपर लीक और छात्रों पर पुलिसिया बल प्रयोग को लेकर केंद्र सरकार को लगातार घेरा। यह बेहद चर्चा का विषय रहा कि देश के सबसे शक्तिशाली नेताओं में शुमार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, पूरे 18 दिनों के व्यवधान के दौरान सदन की नियमित बहसों और कार्यवाहियों से लगभग अनुपस्थित रहे। सत्र के बिल्कुल आखिरी दिन वे महज कुछ मिनटों के लिए सदन में दिखाई दिए, जिसके तुरंत बाद संसद अनिश्चित काल के लिए स्थगित हो गई। गृह मंत्री की यह लंबी अनुपस्थिति विपक्ष के लिए एक बड़ा मुद्दा बन गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति दर्शाती है कि भाजपा युवाओं के इस तीखे आक्रोश और राहुल गांधी के आक्रामक सवालों का सीधे सदन में सामना करने से कतरा रही थी।

राजनीति में नैरेटिव की लड़ाई बहुत मायने रखती है। अब तक भाजपा विपक्ष को कमजोर और दिशाहीन साबित करने का नैरेटिव बनाती आई थी, लेकिन राहुल गांधी के हालिया कदमों ने इस नैरेटिव को पलट दिया है। छात्रों के मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाकर उन्होंने यह साबित किया है कि लोकतंत्र में संवाद और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा ही सर्वोपरि है। यदि सत्ता पक्ष इस युवा आक्रोश और विपक्षी आक्रामकता का समाधान केवल दमन या दूरी बनाकर करना चाहेगा, तो आने वाले समय में युवाओं का यह झुकाव देश की राजनीतिक दिशा को पूरी तरह बदलने की क्षमता रखता है।

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