JHAHIN/2014/58773

क्या सभी समस्याओं का एक ही समाधान, वंदे मातरम गाओ और सबकुछ भूल जाओ !

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धर्मेंद्र कुमार

भारत जैसे विशाल और सांस्कृतिक रूप से विविध देश में राष्ट्रवाद, एकता और प्रगति के पैमानों पर अक्सर गंभीर वैचारिक बहस होती रही है। हाल के दिनों में यह विमर्श फिर तेज हुआ है कि क्या ‘वंदे मातरम‘ जैसे राष्ट्रीय प्रतीकों और देशभक्ति की भावना को आत्मसात करके देश की सभी समकालीन समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है? क्या सभी समस्याओं का एक मात्र ही समाधान है कि, वंदे मातरम गाओ और सबकुछ भुल जाओ ! यह सही है कि बंकिम चंद्र चट्टोपध्याय द्वारा रचित और स्वतंत्रता संग्राम की मुख्य ऊर्जा का श्रोत रहा यह गीत निःसंदेह हर भारतीय के मन में राष्ट्र के प्रति अगाध प्रेम और समर्पण का संचार करता है। लेकिन, एक परिपक्व और आधुनिक लोकतंत्र के रूप में हमें जाति, धर्म और वर्ग की संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठकर इस विषय पर अत्यंत गंभीर और व्यावहारिक मंथन करने की आवश्यकता है।

ऐतिहासिक और भावनात्मक दृष्टिकोण से देखें तो ‘वंदे मातरम‘ केवल एक गीत नहीं, बल्कि मातृभूमि की वंदना और उसकी संप्रभुता का संकल्प है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस उद्घोष ने देश की बिखरी हुई जनता को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक सूत्र में पिरोने का काम किया था। आज भी, जब देश का हर नागरिक राष्ट्र प्रथम की भावना से प्रेरित होता है, तो समाज में व्याप्त कई विसंगतियों को दूर करने का हौसला मिलता है। यदि राष्ट्र के प्रति समर्पण की इस भावना को प्रशासनिक ईमानदारी, नागरिक कर्तव्यों के पालन और सामाजिक सौहार्द से जोड़ दिया जाए, तो भ्रष्टाचार, कानून व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा जैसी कई बुनियादी समस्याओं पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। देशभक्ति की भावना नागरिकों में एक ‘सामूहिक जिम्मेदारी‘ का भाव पैदा करती है, जो किसी भी देश के विकास की रीढ़ होती है।

लेकिन, जब हम व्यावहारिक धरातल और नीतिगत स्तर पर देश की गंभीर समस्याओं की समीक्षा करते हैं, तो परिदृश्य काफी अलग और जटिल नजर आता है। भारत वर्तमान में बेरोजगारी, पेपर लीक, आर्थिक असमानता, जर्जर बुनियादी ढांचा, कुपोषण और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी जैसी ठोस और ढांचागत चुनौतियों से जूझ रहा है। इन समस्याओं का समाधान केवल वंदे मातरम गीत गाने से तो संभव नहीं है। उदाहरण के लिए, युवाओं को रोजगार देने के लिए ठोस आर्थिक नीतियों, औद्योगिक निवेश और कौशल विकास की आवश्यकता होती है। शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने और पेपर लीक जैसी व्याधियों को रोकने के लिए सख्त कानूनी तंत्र, पारदर्शी परीक्षा प्रणालियों और आधुनिक तकनीक की दरकार है, न कि केवल वैचारिक बहसों की।

व्यावहारिक दृष्टिकोण से यह समझना जरुरी है कि किसी भी देश की प्रगति के दो मुख्य स्तंभ होते हैं—‘सांस्कृतिक चेतना‘ और ‘प्रशासनिक सुशासन‘। ‘वंदे मातरम‘ हमारे भीतर सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना को जागृत करता है, जो समाज को जोड़े रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। लेकिन इस चेतना को जमीन पर उतारने के लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, निष्पक्ष न्याय प्रणाली और धर्म-जाति से परे उठकर बनाई गई जनकल्याणकारी नीतियों की आवश्यकता भी होती है। जब तक देश के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक आजीविका नहीं मिलेगी, तब तक राष्ट्रवाद की परिकल्पना पूरी तरह साकार नहीं हो सकती।

‘वंदे मातरम‘ देश की हर समस्या का सीधे तौर पर समाधान नहीं है। समय की मांग है कि हम प्रतीकों की राजनीति से आगे बढ़कर उनके मूल संदेश—अर्थात मातृभूमि और उसके नागरिकों की सेवा—को अपनाएं। जब देश का हर वर्ग और तंत्र पूरी ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करेगा, तभी हम एक सशक्त, समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण कर पाएंगे।

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