आईविजन व्यूरो
भारत के घरेलू बाजार में मिठास देने वाली चीनी आज आम आदमी के लिए ‘चक्करघिन्नी‘ का सबब बन गई है। अचानक चीनी की कीमतों में 20 प्रतिशत से अधिक हुई की बढ़ोतरी से बिना डायबिटीज के ही आम जनता का सिर चक्कर खाने लगा है। रसोई का बजट पूरी तरह गड़बड़ा चुका है, लेकिन इस बेलगाम महंगाई से ज्यादा चौंकाने वाली और उलझा देने वाली सरकार की वे नीतियां हैं, जिनके विरोधाभासों ने इस संकट को जन्म दिया है। यह स्थिति केंद्र सरकार के नीतिगत भटकाव और विभागों के बीच आपसी तालमेल की भारी कमी को स्पष्ट रूप से उजागर करती है।
चीनी की कीमतों में आई इस हालिया तेजी ने एक यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है कि जब देश में गन्ने का उत्पादन पिछले वर्षों की तरह ही सामान्य रहा है और चीनी का उत्पादन भी पहले की तुलना में बेहतर हुआ है, तो फिर कीमतों में यह बढ़ोतरी क्यों? साल 2026 की शुरुआत में सरकार ने बड़े उत्साह के साथ चीनी निर्यात करने का फैसला लिया और लगभग 8 लाख टन चीनी देश से बाहर भेज दी गई। लेकिन कुछ ही महीनों बाद, मई 2026 में सरकार को अचानक अपनी गलती का एहसास हुआ और निर्यात पर पूरी तरह रोक लगा दी गई। हद तो तब हो गई जब निर्यात करने वाला देश अब चीनी आयात करने की संभावनाएं तलाशने लगा है। जब सरकार खुद यह स्वीकार कर चुकी है कि इस सीजन में इथेनॉल निर्माण के लिए गन्ने के उपयोग में 3 से 6 प्रतिशत तक की कटौती की गई है ताकि चीनी की उपलब्धता बनी रहे, तब भी कीमतों का नियंत्रण से बाहर होना सरकार के बाजार प्रबंधन पर बड़ा सवालिया निशान लगाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि बाजार में ‘खुला खेल फर्रुखाबादी‘ चल रहा है और जमाखोरों व सटोरियों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं रह गया है।
इन तमाम नीतिगत विफलताओं के बीच जख्मों पर नमक छिड़कने का काम सत्ता पक्ष के नीति-निर्माताओं और मंत्रियों के अजब-गजब बयान कर रहे हैं। सरकार के एक ‘अति विद्वान‘ मंत्री ने महंगाई को सही ठहराते हुए कुतर्क दिया है कि चीनी के दाम बढ़ने से लोग इसका सेवन कम करेंगे, जिससे देश में डायबिटीज (मधुमेह) के मरीजों की संख्या में कमी आएगी। जनसामान्य की पीड़ा के प्रति ऐसा असंवेदनशील और हास्यास्पद रवैया केवल मौजूदा सत्ता के अहंकार को दर्शाता है। महंगाई को जनस्वास्थ्य के सुधार से जोड़ना प्रशासनिक दिवालियापन की पराकाष्ठा है। सरकार को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में नीतियां जनता को राहत देने के लिए बनाई जाती हैं, उन्हें चक्करघिन्नी बनाने के लिए नहीं। यदि समय रहते चीनी के बाजार को नियंत्रित नहीं किया गया और इथेनॉल नीति की व्यावहारिक समीक्षा नहीं की गई, तो जनता का यह नीतिगत असंतोष आने वाले समय में राजनीतिक कड़वाहट में बदल सकता है।

















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