JHAHIN/2014/58773

बिहार का सियासी द्वंद्व: पटना स्नातक सीट पर प्रतिष्ठा, प्रतिशोध और राजनीतिक भविष्य

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धर्मेद्र कुमार

बिहार की राजनीति में पटना स्नातक विधान परिषद सीट पर 23 अक्टूबर को होने वाला मतदान केवल एक निर्वाचन क्षेत्र का सामान्य चुनावी मुकाबला नहीं रह गया है। यह सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के भीतर सुलगते आंतरिक अंतर्विरोधों, दलीय अनुशासन और क्षेत्रीय वर्चस्व की राजनीति का एक ऐसा खुला दस्तावेज बन चुका है, जिसके परिणाम राज्य के भविष्य के सियासी समीकरणों को प्रभावित करेंगे। मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह द्वारा अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता और वर्तमान विधान परिषद के प्रत्याशी (एमएलसी) नीरज कुमार के खिलाफ खुली बगावत और प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के प्रत्याशी डॉ. अनुज सिंह का समर्थन करना बिहार की समकालीन राजनीति में ‘व्यक्ति बनाम दल’ के पुराने द्वंद्व को पुनः केंद्र में ले आया है।

विधान परिषद चुनाव पर तात्कालिक प्रभाव

 पटना स्नातक सीट का यह निर्वाचन क्षेत्र बौद्धिक, जागरूक और सामान्यतः वैचारिक आधार पर मतदान करने वाले ‘स्नातक’ मतदाताओं का माना जाता है। लेकिन अनंत सिंह के मैदान में उतरकर रोड शो करने और नवादा से पटना तक समानांतर गोलबंदी करने के कारण यह पारंपरिक रूप से लड़ा जाने वाला चुनाव अब पूरी तरह से जातीय और क्षेत्रीय प्रभाव की लड़ाई में तब्दील हो चुका है। जदयू के आधिकारिक प्रत्याशी नीरज कुमार को जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पार्टी नेतृत्व का स्पष्ट समर्थन प्राप्त है, वहीं पार्टी के ही वर्तमान विधायक अनंत सिंह द्वारा विपक्षी खेमे (जन सुराज) के उम्मीदवार के पक्ष में ‘पेटी भर वोट’ देने की अपील ने इस सीट पर मुकाबले को त्रिकोणीय और अनिश्चित बना दिया है। यहां अनंत सिंह का यह रुख वैचारिक आधार पर नहीं बल्कि विशुद्ध रूप से एक व्यक्तिगत अदावत (जिसमें वे 2019 के एके-47 मामले में खुद को फंसाने के पीछे नीरज कुमार की भूमिका का आरोप लगाते हैं) पर टिका है। यह भावनात्मक और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप स्नातक मतदाताओं के धड़े को भी विभाजित करने की क्षमता रखता है।

क्षेत्रीय राजनीति पर दूरगामी असर

 राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन राजनीति और सांगठनिक मजबूती का दावा करने वाली पार्टियों के लिए यह स्थिति एक खतरनाक नजीर है। यदि कोई विधायक अपनी ही पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार को हराने का खुला आह्वान करता है, तो यह राजनीतिक दलों के आंतरिक अनुशासन के कमजोर होने का स्पष्ट संकेत है। वहीं  केंद्रीय मंत्री ललन सिंह का यह बयान कि “वे दोनों नेताओं के बीच तभी समझौता करा सकते हैं जब दोनों तैयार हों,” यह दर्शाता है कि शीर्ष नेतृत्व भी इन मजबूत क्षेत्रीय क्षत्रपों के व्यक्तिगत निर्णयों के आगे अपनी सीमाएं महसूस कर रहा है। यह प्रवृत्ति आने वाले विधानसभा चुनावों में टिकट बंटवारे और दलीय वफादारी के संकट को और बढ़ाएगी। उधर इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को मिलता दिख रहा है। यदि जेडीयू का एक धड़ा अंदरूनी कलह के कारण विपक्षी या निर्दलीय प्रत्याशी की मदद करता है, तो यह पारंपरिक राजनीतिक दलों (जैसे जदयू और राजद) के वोट बैंक में सेंधमारी करने की कोशिश कर रही नई ताकतों के लिए एक मुफीद मैदान तैयार करता है।

 नीरज कुमार को नीतीश कुमार का बेहद करीबी और मुखर प्रवक्ता माना जाता है। इस चुनाव का परिणाम सीधे तौर पर पार्टी के भीतर नीतीश कुमार के सांगठनिक नियंत्रण और ‘अपराधमुक्त राजनीति’ के उनके पुराने दावों की कसौटी होगा, विशेषकर तब जब अनंत सिंह हाल ही में अदालत से राहत मिलने के बाद पुनः जेडीयू के बैनर तले अपनी ताकत दिखा रहे हैं।

यह राजनीतिक संघर्ष इस बात का स्पष्ट संकेत है कि बिहार की राजनीति आज भी पूरी तरह से संस्थागत दलीय ढांचे में नहीं ढल पाई है। यहां व्यक्तिगत रंजिशें, क्षेत्रीय बाहुबल और व्यक्तिगत प्रभाव कभी भी दलीय नीतियों पर हावी हो जाते हैं। पटना स्नातक सीट पर होने वाला चुनाव परिणाम केवल किसी एक नेता की हार या जीत तय नहीं करेगा, बल्कि यह आने वाले समय में JDU के भविष्य के सांगठनिक स्वरूप और बिहार में नए गठबंधन समीकरणों की रूपरेखा भी तय करेगा। चुनाव के नतीजों के बाद जेडीयू नेतृत्व इस अनुशासनहीनता पर क्या कदम उठाता है, इसी पर पार्टी की आंतरिक साख निर्भर करेगी।

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