धर्मेंद्र कुमार
देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादा दांव पर लगी हो, तो सड़कों का सुलगना और अदालतों का हस्तक्षेप अपरिहार्य हो जाता है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली इस समय जिस प्रकार एक अघोषित प्रशासनिक छावनी में तब्दील की गई है, वह न केवल हैरान करने वाला है, बल्कि सत्ता प्रतिष्ठान के उस निरंकुश हठ को भी उजागर करता है जो जनभावनाओं को सुनने के बजाय उन्हें बलपूर्वक कुचलने में विश्वास रखता है। मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार और निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) में कथित विसंगतियों के खिलाफ उपजा जनाक्रोश अब एक राष्ट्रीय संकट का रूप ले चुका है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि केंद्र की कार्यपालिका ने न केवल आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों को बंधक बनाया, बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों की भी खुलेआम अवहेलना करने का दुस्साहस किया है।
विवाद के मूल में निर्वाचन आयोग की साख और उसके आंतरिक लोकतंत्र पर उठ रहे सवाल हैं। आरोप गंभीर हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने दो सहयोगी आयुक्तों की असहमति और आपत्तियों को दरकिनार कर एकतरफा फैसले लिए। जब लोकतंत्र की सबसे बुनियादी प्रक्रिया—यानी मतदाता सूची की शुचिता—संदेह के घेरे में आ जाए, तो जनता का सड़कों पर उतरना स्वाभाविक है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) और विभिन्न छात्र-युवा संगठनों के आह्वान पर शुरू हुआ यह आंदोलन शांतिपूर्ण और निहत्था था। परंतु, सरकार ने इस लोकतांत्रिक प्रतिरोध का सामना राजनीतिक संवाद से करने के बजाय दमन चक्र चलाकर किया। जंतर-मंतर की ओर बढ़ रहे युवाओं, वकीलों और विपक्षी नेताओं को न केवल बर्बरता से हिरासत में लिया गया, बल्कि पूरी दिल्ली की धड़कन कही जाने वाली मेट्रो सेवाओं को बाधित कर और इंटरनेट पर पाबंदी लगाकर आम नागरिकों के जीवन को नर्क बना दिया गया।
प्रशासन की इस दमनकारी नीति और मनमाने प्रतिबंधों पर गंभीर रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था और ९ अक्टूबर को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए थे। अदालत ने साफ कहा था कि शांतिपूर्ण ढंग से एकत्रित हो रहे नागरिकों को अवैध रूप से हिरासत में न लिया जाए, मेट्रो और परिवहन सेवाएं सामान्य रूप से संचालित रहें और अदालतों तक वकीलों व आम जनता की पहुंच बाधित न हो। विडंबना देखिए कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर दिल्ली पुलिस और केंद्रीय गृह मंत्रालय ने रविवार को सर्वोच्च न्यायालय के इन आदेशों की खुलेआम धज्जियां उड़ा दीं। 45 से अधिक मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वारों को बंद रखा गया, शिवाजी पार्क से लेकर कनॉट प्लेस तक बैरिकेड्स की दीवारें खड़ी कर दी गईं और नागरिकों को बलपूर्वक बसों में भरकर अज्ञात स्थानों पर ले जाया गया। यह सीधे तौर पर अदालत की अवमानना और कानून के शासन को चुनौती देने जैसा कृत्य है।
कार्यपालिका के इस रवैये से नाराज सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ ने रविवार को एक बार फिर तीखी फटकार लगाते हुए केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और चुनाव आयोग को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। अदालत का यह सख्त रुख देश के नागरिकों के इस विश्वास को बहाल करता है कि सत्ता की निरंकुशता के खिलाफ एक प्रहरी अभी जाग रहा है। यह मामला केवल एक चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग या कुछ राजनीतिक दलों के विरोध प्रदर्शन तक सीमित नहीं रह गया है। यह सवाल सीधे तौर पर हमारे संवैधानिक संतुलन का है। क्या कोई चुनी हुई सरकार कानून से ऊपर हो सकती है? क्या शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को प्रशासनिक आदेशों के जरिए कुचला जा सकता है?
लोकतंत्र केवल मतदान के दिन तक सीमित नहीं होता, बल्कि संस्थाओं की पारदर्शिता और जन-आवाज के प्रति सरकार की जवाबदेही में इसकी आत्मा बसती है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर लगे आरोपों की निष्पक्ष जांच जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी नागरिकों के शांतिपूर्ण नागरिक अधिकारों की सुरक्षा भी है। केंद्र सरकार को यह समझना होगा कि अदालती आदेशों की अवहेलना कर और असहमति की आवाजों को संगीनों के साये में दबाकर कोई भी व्यवस्था लंबे समय तक अपनी साख नहीं बचा सकती। अब समय आ गया है कि सरकार दमनकारी हठ छोड़कर सर्वोच्च न्यायालय के प्रति अपनी जवाबदेही तय करे और चुनाव आयोग की गिरती विश्वसनीयता को बहाल करने के लिए पारदर्शी कदम उठाए।
















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