धर्मेंद्र कुमार
बिहार की राजनीति में ‘पैटर्न’ और ‘पॉकेट’ का खेल नया नहीं है, लेकिन पटना स्नातक विधान परिषद चुनाव ने सत्ताधारी दल के भीतर के उस अंतर्विरोध को सतह पर ला दिया है, जिसे अब तक अनुशासन की चादर से ढकने की कोशिश की जा रही थी। जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के वरिष्ठ नेता और निवर्तमान एमएलसी नीरज कुमार का सोमवार को हुआ नामांकन केवल एक चुनावी औपचारिकता नहीं था, बल्कि यह जदयू के भीतर और विशेष रूप से बिहार के रसूखदार ‘भूमिहार समाज’ में मचे आंतरिक घमासान का खुला प्रदर्शन था।
इस बार का चुनाव पारंपरिक रूप से एकजुट माने जाने वाले भूमिहार समाज के वैचारिक बिखराव की गवाही दे रहा है। नीरज कुमार के समर्थकों का हुजूम एक स्पष्ट संदेश देने की कोशिश कर रहा था कि समाज का बौद्धिक तबका अपनी विरासत स्वामी सहजानंद सरस्वती और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जैसी विद्वान विभूतियों में देखता है, न कि बाहुबल की स्थापित परिभाषाओं में। तीन बार (2020 में जीत की हैट्रिक लगाने वाले) इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके नीरज कुमार की ताकत उनकी वाकपटुता और सांगठनिक समझ है। परंतु, राजनीति में सैद्धांतिक निष्ठा अक्सर व्यक्तिगत प्रतिशोध और दलीय इतिहास के आगे लाचार हो जाती है।
दूसरी तरफ, जदयू के ही पूर्व विधायक अनंत सिंह द्वारा खोला गया मोर्चा इस लड़ाई को त्रिकोणीय और पेचीदा बना रहा है। अनंत सिंह इस बार जन सुराज पार्टी के प्रत्याशी डॉ. अनुज सिंह के पीछे अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं। प्रशांत किशोर की पार्टी ‘जन सुराज’ की इस चुनाव में एंट्री ने केवल एनडीए ही नहीं, बल्कि समूचे जातीय समीकरणों को हिला कर रख दिया है। जन सुराज जिस नए राजनीतिक विकल्प और ‘शिक्षित व स्वच्छ छवि’ की बात कर रहा था, उसे इस सीट पर भूमिहार बहुल वोटों के बिखराव और अनंत सिंह के पारंपरिक जनाधार का साथ मिल गया है। यह समीकरण एनडीए के पारंपरिक कोर-वोट बैंक में सीधी सेंधमारी कर रहा है।
इस विरोध की जड़ें पुरानी हैं। अनंत सिंह के समर्थकों का तर्क है कि जब अतीत में नीतीश कुमार के निर्देश पर अनंत सिंह चुनाव लड़ रहे थे, तब नीरज कुमार ने दलीय अनुशासन को ताक पर रखकर उनका खुला विरोध किया था। खासकर, 2015 और 2020 के मोकामा विधानसभा चुनावों के दौरान इन दोनों नेताओं के बीच हुआ सीधा और परोक्ष टकराव किसी से छिपा नहीं है। जब अनंत सिंह के खिलाफ कानूनी फंदा कसा था, तब नीरज कुमार ने उन्हें ‘आपराधिक प्रवृत्ति’ का बताकर मोकामा में घेराबंदी की थी। आज अनंत सिंह उसी राजनीतिक कुकृत्य का हिसाब चुकता करने के लिए जन सुराज के पाले में खड़े होकर जदयू की राह में कांटे बो रहे हैं।
इस पूरे प्रकरण में सबसे विचारणीय मोड़ जदयू सांसद और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह के बयानों और उनकी रहस्यमयी चुप्पी से आया है। ललन सिंह ने यह तो स्वीकार किया कि नीरज कुमार पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने अतीत की उन घटनाओं को भी कुरेद दिया जब अनंत सिंह ने बिना शर्त नीतीश सरकार को संकट से उबारा था। ललन सिंह का यह कहना कि ‘नीरज कुमार ने जो किया था, यह उसी की प्रतिक्रिया है,’ राजनीतिक विश्लेषकों के लिए साफ इशारा है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के एक धड़े का मौन संरक्षण कहीं न कहीं इस अंतर्विरोध को हवा दे रहा है।
पटना स्नातक क्षेत्र की इस प्रतिष्ठित सीट पर जहां मतदाता प्रबुद्ध और शिक्षित वर्ग है, वहां धनबल, बाहुबल, दलीय अंतर्द्वंद्व और ‘जन सुराज’ के नए उभार का यह घालमेल केवल एक सीट का फैसला नहीं करेगा। यह परिणाम तय करेगा कि क्या बिहार का सबसे जागरूक मतदाता वर्ग अब भी पारंपरिक लामबंदी का हिस्सा है, या वह आंतरिक विरोधाभासों के कारण बिखर चुका है। राजनीति संभावनाओं का खेल है, और फिलहाल यह खेल एनडीए गठबंधन के लिए आंतरिक मोर्चे पर एक गंभीर खतरे की घंटी बन चुका है। परिणाम का इंतजार करना समीचीन होगा।
















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