JHAHIN/2014/58773

‘एसआईआर’ के चक्रव्यूह में सरकारः क्या ज्ञानेश कुमार बन गए हैं सत्ता की ‘गले की हड्डी’?

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नाकेबंदी, इंटरनेट पर पाबंदी और ‘एसआईआर‘ का खौफ… क्या सहम गई है दिल्ली की सत्ता?

धर्मेंद्र कुमार

भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता शासन व्यवस्था की रीढ़ होती है। लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर देश में जो अभूतपूर्व राजनीतिक गतिरोध पैदा हुआ है, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष के तीखे तेवरों और सड़क पर उतरते जन-आक्रोश के बीच यह सवाल मौजूं हो चला है कि क्या चुनाव आयोग से जुड़ा यह विवाद अब सरकार के लिए ‘गले की हड्डी’ बनता जा रहा है?

प्रशासनिक सख्ती और सहमी हुई सत्ता का नैरेटिव

राजनीतिक विश्लेषकों और विपक्षी नेताओं का तर्क है कि दिल्ली में इस आंदोलन को रोकने के लिए सरकार द्वारा बरती गई अभूतपूर्व सख्ती उसकी घबराहट को दर्शाती है। प्रदर्शनों को दबाने के लिए मेट्रो और बसों की सेवाओं को बाधित करना और अफवाहों को रोकने के नाम पर इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदी लगाना यह संकेत देता है कि सत्ता पक्ष इस आंदोलन के व्यापक जन-समर्थन से असहज है। लोकतांत्रिक देशों में विरोध प्रदर्शन का अधिकार संवैधानिक है, और जब राज्य मशीनरी किसी शांतिपूर्ण मार्च को रोकने के लिए पूरी दिल्ली की नाकेबंदी कर देती है, तो इससे जनता में यह संदेश जाता है कि सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने के बहाने असल में असंतोष की आवाज को दबाना चाहती है।

एसआईआर (SIR) का विवाद और जनता में अविश्वास

इस पूरे टकराव के केंद्र में ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) की प्रक्रिया है। विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इस अभियान के नाम पर मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर विसंगतियां पैदा की गई हैं, जिससे आम नागरिकों को अपनी पहचान और लोकतांत्रिक अधिकार साबित करने के लिए भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। जनता के मन में यह शंका गहरी हो रही है कि क्या इन प्रशासनिक बदलावों के पीछे कोई राजनीतिक हित छिपा है?

जब मीडिया रिपोर्ट्स में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त के फैसलों पर उंगलियां उठाई गईं, तो जनता का यह संशय और गहरा हो गया। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इस पुनरीक्षण प्रक्रिया से जुड़े तकनीकी और व्यावहारिक सवालों पर न तो आयोग की तरफ से और न ही सत्तापक्ष की तरफ से कोई स्पष्ट और संतोषजनक जवाब सामने आ रहा है। संवादहीनता की यह स्थिति लोकतंत्र के लिए घातक है।

आंतरिक दरारें और साख का दांव

इस विवाद की तपिश अब सरकार के भीतर भी महसूस की जाने लगी है। अंदरूनी सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में शामिल कुछ सहयोगी दल भी दबी जुबान से सरकार के इस रवैये पर आपत्ति जता रहे हैं। उनका मानना है कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता।

सत्तापक्ष द्वारा चुनाव आयोग के हर फैसले का बिना शर्त बचाव करने से तटस्थ नागरिकों के मन में भी यह धारणा बन रही है कि स्वायत्त संस्थाओं की निष्पक्षता खतरे में है। सरकार के सामने अब संकट यह है कि वह न तो मुख्य चुनाव आयुक्त के फैसलों से पूरी तरह पल्ला झाड़ पा रही है और न ही जनता के बीच गिरती अपनी साख को संभाल पा रही है।

किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए उसकी सबसे बड़ी ताकत जनता का भरोसा होती है। यदि मतदाता सूची जैसी बुनियादी चीज को लेकर नागरिकों के मन में ‘अनजाना भय’ या शंका का माहौल है, तो उसे दूर करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। बल प्रयोग या इंटरनेट की तालाबंदी से आंदोलनों को कुछ समय के लिए रोका जा सकता है, लेकिन जनता के मन में उठे सवालों को दबाया नहीं जा सकता। यदि सरकार को अपनी साख बचानी है, तो उसे हठधर्मिता छोड़कर विपक्ष और आम नागरिकों के साथ मेज पर बैठकर इन चिंताओं का पारदर्शी समाधान निकालना होगा, अन्यथा यह राजनीतिक गतिरोध देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने को गहरा नुकसान पहुंचाएगा।

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